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Thursday, June 6, 2013

सच कहें तो बढ़े हैरान हैं हम।



सच कहें तो बढ़े हैरान हैं हम
अभी अपने ही रिश्तों से।
जिसपर भी करते हैं भरोसा
ना जाने क्यों वही देते हैं धोखा

कभी डरते थे दुनिया से हम
मगर आज खुद से ही डरते हैं
क्यों होता है ऐसा मेरे साथ
क्या मैं ना करूँ किसी से बात
सच कहें तो बढ़े हैरान हैं हम।

रिश्तों में ढला मेरा बचपन
आज रिश्तों से डर लगता है
मदद करने से पहले हर कोई
बीते वक़्त को खोजता है
सच कहें तो बढ़े हैरान हैं हम।

बढा ही अजीब सिस्टम लगता है मुझे
लोगों का लोगों से जुड़ने का,
उनके अनुभव से ज्यादा
उनके वज़ूद को सोचते हैं
सच कहें तो बढ़े हैरान हैं हम।

Tuesday, May 28, 2013

मुझसे ये ज़िन्दगी


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न जाने क्या चाहती है
मुझसे ये ज़िन्दगी।

जब भी कोई कदम बढ़ाया है
ज़हन में एक सवाल छोड़कर
उसका जवाब चाहती है
मुझसे ये ज़िन्दगी।

मेरी हर चाहत को तोड़ा है इसने
मेरा एक हमदर्द बनकर
उसके बदले मेरे आंसू चाहती है
मुझसे ये ज़िन्दगी।

जब भी मैं सोचती हूँ इसके बारे में
तो दिल से यही दुआ निकली है
मिल जाए इसे जो ये चाहती है
मुझसे ये ज़िन्दगी।


Thursday, October 18, 2012

किसी की ज़िन्दगी...


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क्यों पहेली बन जाती है किसी कि ज़िन्दगी,
क्यों सहेली बन जाती है किसी कि ज़िन्दगी।

जब भी सुलझाती हूँ कभी
खुद ही उलझ जाती हूँ...
कहीं गुम होती नज़र आती है
पर आख़िर क्यों तड़पा जाती है
किसी कि ज़िन्दगी।

न जाने क्या सोचे बैठी है
कभी खुशी तो ग़म देती है
कभी ले आती है बहार
तो कभी उजाड़ जाती है
किसी कि ज़िन्दगी।

किसी मौके पर झूमती है
तो कभी दर्द में कराहती है
होने नहीं देती है अहसास
किसी को अपने दर्द का
किसी कि ज़िन्दगी।

क्यों पहेली बन जाती है किसी कि ज़िन्दगी,
क्यों सहेली बन जाती है किसी कि ज़िन्दगी।