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Wednesday, May 20, 2015

पायल से कुछ मुलाकात।


बात तब की है जब पढाई रास नहीं आती थी। सिर्फ ये सूझता था कि ऐसा क्या किया जाये की थोड़ी बहुत आमदनी का जुगाड़ भर हो जाये। मेरा ऐसा सोचना कि एक फ्रेंड ने अपनी बहन का पार्लर का प्रस्ताव मेरे आगे रखा। मैं चली भी गई सीखने और उसी काम को आगे बढ़ाने की सोच लिए।

 (जाने कितने अरमान जाग जाते हैं पलभर में जब कुछ सोचा हो और उस काम की शुरुआत भर भी हो जाये तो सपने उढ़ान भरने लगते हैं और आप ख़्वाहिशों के आसमान पर होते हैं। वाह, क्या फिलिंग होती है वो। पल भर भी थमना नहीं चाहते है आप।बस कुछ ऐसा ही था। उस वक़्त मेरे साथ भी। उम्र कोई ज़्यादा भी नहीं थी। 15-16 साल की ।)

वहीँ मिली थी मैं पायल से ज़हनी तौर पर। हालाँकि कोई अच्छी लड़की नहीं थी वह मेरी नज़र में। मेरी ही हमउम्र थी लेकिन मेरे बिल्कुल विपरीत। रास्ते चलते वह किसी को भी छेड़ दिया करती थी। गाली-गलोच तो पूछो मत। हम भी जब कभी खेला करते तो हमारा खेल भी बिगाड़ दिया करती थी। पूरे दिन साईकिल पर सवार यहाँ से वहाँ ही घूमती रहती। जैसे उसकी माँ उसे कभी न रोकती हो। पापा उसकी गाली पर कभी न टोकते हों और उसके भाई उसके साथ न खेलते हों। वह हर किसी को गलियां दे दिया करती थी। पार्लर में मुझे देख बात करने की कोशिश किया करती थी। मैं उसे एक नज़र भी नहीं देखती थी। ज्यों ज्यों वह बातें करती मैं उतना ही कट जाती। अब मेरी बेरुख़ी उसे पसंद न आती। वह अक़्सर कहती तू इतना चुप क्यों रहती है? मुझसे बात क्यों नहीं करती।

मैंने छूटते ही कहा- तुम इतनी गलियां देती हो। किसी से भी लड़ती हो। मुझे तुम पसंद नहीं। उसे बहुत बुरा लगा। वह बहुत इमोशनल हो गई थी। पार्लर वाली दीदी ने उसे सात्वना दी और बात पलटने की कोशिश भी की। तभी दीदी का फ़ोन बज उठा और वह बाहर चली गई।

मुझे अपनी हरक़त पर पछतावा हुआ। मैंने उसे साफ़ शब्दों में वही दोहरा दिया जो मुझे कहा जाता है अक़्सर।

लड़कियों को गाली नहीं देनी चाहिए। लड़को से झगड़ा नहीं करना चाहिए। न पूरे दिन घूमना चाहिए। तेरे मम्मी पापा कुछ नहीं कहते तुझे?

वह रोने लगी। मैं डर गई कि दीदी मुझे ही डांटेगी तो उसे चुप करने के लिए मनाने लगी। उसके आंसू पोछे। वह मेरे गले लग पड़ी और बोली-मेरे मम्मी पापा यहाँ नहीं हैं । मम्मी मुझसे मिलने आती है कभी कभी। फ़ोन भी कर लेती है। जिनके साथ मैं रहती हूँ वह ही मुझे ये सब सिखाते हैं। रोज़ पैसे मिलते हैं मुझे। मुझे डांस करना सिखाते हैं। ढ़ोलक बजाना मुझे बेहद पसंद है।
मैंने उसे कहा- पागल कैसे रहती है तू अनजान लोगों के साथ मम्मी की याद नहीं आती?

वह बोली- ये लोग जाने नहीं देते। कहते हैं तू हममें से है हमारे साथ ही रहेगी। तेरी माँ ने तुझे पता नहीं कैसे इतने साल छुपा के रख लिया। ये लोग बहुत प्यार से रखते है मुझे। मैं एक बार भाग गई थी। मेरी बढ़ी बी बहुत रोइ थी।मैं उनके पास ही रहती हूँ। वह मुझे समझाती है कि हम हिजड़े हैं और हमें ऐसे ही रहना है। गाली देना हमारे लिए कुछ ग़लत नहीं है। मैं अपनी मण्डली के साथ दुआऍं देने जाती हूँ ये शगुन का काम है।

पायल पूरी बात कहती कि दीदी ने बाहर से पायल को आवाज़ दी। उसकी बी ने उसे बुलाया था। उस वक़्त हम इतना ही जानते थे कि हिजड़े होते हैं कौन होते है पता नहीं। बस गलियों में किसी मौके पर नाचने आते हैं तालियां बजाते हैं लेकिन पायल नहीं बजाती थी। वह हमसे अलग है न वो जानती न मैं। मैं अपनी माँ के साथ रहती हूँ वह क्यों नहीं। कितनी गन्दी मम्मी थी उसकी जो उसे दूसरों के घर छोड़ दिया क्यों? बस ऐसे ही कुछ सवाल वह छोड़ गई थी।
(बस तालियों और घुँगरू की गूँज की मण्डली देख मुझे वह याद हो आई। )

Tuesday, May 19, 2015

क्या दोस्ती हार गई


यार तुम कहीं पागल तो नहीं हो गए हो लड़की ने खिजियाते हुए कहा।
लड़का मुस्कुराते हुए- पागल की क्या बात है यार। जो मन में आता है वही कह जाता हूँ। 
लड़की - तो गर्ल फ्रेंड बनाओ न। दोस्तों के साथ ऐसी बात। गलत है।
लड़का बात टालते हुए- चलो न डेट करते हैं। उम्र निकल रही है यार।
लड़की- चुप करो समझे तुम।
लड़का- 10-12 किस करते हैं तुम्हें ठीक लगे तो आगे बढ़ जायेंगे। वरना रहने देंगे। 
लड़की गुस्स से- तुम्हें एक अच्छा दोस्त बने रहने में क्या प्रॉब्लम है? ऐसा क्यों सोचते हो मुझे लेकर? 
लड़का- पता नहीं। लेकिन तुम अच्छी लगती हो। तुम्हारा फिगर भी बहुत बढ़िया है। 
लड़की-यार तुम्हे एक दोस्त और गर्ल फ्रेंड में अंतर समझ नहीं आता क्या? या तुम मुझे ऐसा वैसा समझते हो?
लड़का-नहीं यार तुम्हारे लिप्स बहुत अच्छे है। किस करने को मन करता है ।
लड़की फिर गुस्से से- ऐसा है आज के बाद मुझसे बात मत करना प्लीज़।
लड़का- तुम इतनी बढ़ी हो गयी हो एक बार सेक्स करने में क्या जाता है। बन जाओ तुम मेरी गर्ल फ्रेंड। बस एक ही तो प्रॉब्लम है कि हम शादी नहीं कर सकते। तुम्हें भी पता होना चाहिए यार एन्जॉय क्या होता है। सबसे करीब हो मेरे और करीब आ जाओगी तो क्या गलत है।
लड़की- गलत ? ये तुम्हे सही लगता है। संगत ही गलत है तुम्हारी। दोस्त कहते हो और ये सब बातें?????
लड़का- यार इससे दोस्ती ख़राब थोड़े होगी। प्यार भी करता हूँ तुम्हें।
लड़की समझाने की हद ख़त्म करते हुए- देखो अगर यही सब सोचते हो मुझे लेकर तो आज के बाद मुझसे बात मत करना। 
लड़का-ठीक है ।
लड़की रोती है और एक अच्छे दोस्त को खोकर अपने आंसू पोछती है लेकिन ये इस बात से भी सन्तुष्ट थी कि दोस्त गलत राह में है। वह सोचती है ये कैसा प्यार है नज़दीकी है की शरीर की चाह है लेकिन जीवन में आगे चलने का हौसला नहीं।।

कभी-कभी समझ नहीं आता रिश्तों को कैसे समझा जाए। साथ छूटने का दुःख होता है लेकिन रिश्ते में होना घुटन पैदा कर देता है। बेबाक होना हमेशा सुखद नहीं होता किसी के लिए।

Sunday, May 17, 2015

आरुषि और मै



कल सुबह की ही तो बात है। रोज़ की तरह ऑंखें मलती घर में आकर अपनी मुस्कान बिखेरती हुई कहती है। उठ गई दीदी तुम। 
कल भी मेरी आँख तो खुल गई थी लेकिन कुछ देर बिस्तर पर सुस्त पड़े रहना भी अच्छा लगता है। आरुषि कमरे में आई और मेरा हाथ पकड़ कर कहती-

आरुषि- दीदी उठो न। 
मैने करवट लेते हुए कहा- अरे आज तो जल्दी उठ गई आरुषि। 
वो मुस्कुराती हुई जल्दी से बोली- हमारे स्कूल की न छुट्टी पड़ गई। आज तो छुट्टी है।
मैं उठ बैठी और पानी पीकर बोली- अच्छा। अब तो दादी के घर जायेगी आरुषि।है न।
आरुषि- अरे नहीं दीदी। आपको तो पता भी नहीं। हमने तो नया घर ले लिया। आज मम्मी सामान ले जायेगी। मम्मी की भी छुट्टी है और पापा की भी छुट्टी है। बहुत दूर जा रे हैं हम। इस गली में।
वह कहती हुई कभी मेरे भाई को उठाती कभी मेरे मम्मी से बात करने लग जाती।

आज सुबह से आरुषि घर नही आई और न ही सुबह से कोई आवाज़ सुनी। पूछने पर पता चला कि वह हमारे साथ वाला मकान ख़ाली करके चले गए हैं। दो साल से कितनी ही सुबह आरुषि की सच्ची झूठी कहानियों और कितने ही सवालों से हॉच-पॉच होकर गुज़री है। मम्मी से तो बहस ही करती रही है। आज दिन के 8 घण्टे उसकी किसी भी हरकत को देखे बिना गुज़र गए। सन्डे भी सन्डे जैसा नहीं और सुबह भी सुबह जैसी नहीं। 


मुझे पता ही नहीं चला की घर खाली करने की बात सच्ची थी। लगा रोज़ की इतनी कहानियां वो ख़ुद ही तो रच लेती है बातों ही बातों में। अपनी कहानी में ढ़ेरों चित्र ऐसे बुनती की उनका सही दायरा बनाना मेरे बसका तो नहीं होता था। हर चीज़ दायरे से बाहर होती आज़ाद होती। मम्मी किसी बात के लिए टोकती हैं तो साफ़ साफ़ न कह देती है जिसपर मेरे होठों पर मुस्कान आ जाती है।

Wednesday, November 19, 2014

दिल्ली दर बदर

कदम दर कदम बढ़ते जा रहे थे और नज़र इधर से उधर  कभी नीचे तो कभी.… कितना बदला हुआ लगता  शाम का वक़्त यहाँ सड़क के  किनारों पर धुंआ -धुंआ बिखरा, उढ़ता हुआ .… घरों के  बाहर  सबके चूल्हों पर रोटियां सिक  रही हैं।

वहीं मुँडेरियों पर खेलते बच्चों के हाथों में उनकी माँ रोटियां थमाए उन्हें कपडे से भी ढक रही हैं ठण्ड की ओस से भीगे कपड़ों में वो नन्हे  उसे छोड़ भागते हैं।  इस ठण्ड से बेखबर से  बच्चे इस ठण्ड के मौसम को भी गर्मी  दे रहे हैं। …

 बगल से ही गुजरती इस सड़क पर रेड-लाईट  होते ही अपना हुनर प्रस्तुत करना  शुरू कर देते हैं। नज़र ठहर सी ही है इस सड़क से गुज़रते हुए।

आगे जाते हुए और उनकी नज़रों से नज़र मिलते होठों के छोरों से निकल गया.…कि बन गया खाना ?
अपनी फुकनी मुंह के आगे से हटाते हुए और मुस्कराहट बिखराकर गीली आँखों को भींचते हुए  कहा , हाँ बना रहे हैं दिहाड़ी पर निकलना है न।  दिन में तो  बच्चा कर खाते है। यूँ दो टूक बाते कर उस सड़क से गुज़रना होता है और हर दिन में एक डर भी सीने से गुज़रता है। इन नन्हों का यूँ बेफिक्री से सड़क के बीच उतर जाना।


Tuesday, March 18, 2014

होली

क्या खूब थी
इस बार की होली
दो दिन पहले से ही
माँ ने लगा दी होड़
गुजियों और पकोड़ों की
मेरे घर की तो
लगता है ये रीत है पुरानी
 दही बड़े और पकोड़ों की
मांग ही है की जाती
मैं क्या बढ़ी हुई
अब मुझे भी माँ
इन सब कामो में है लगा लेती
कहती है तू अब सीख ले
अपने घर जाकर
तुझे भी तो यह सब करना है
सास, ससुर देवर, जेठ
और ननद का मन हरना है
मैं झुंझलाकर कहती
 चुप हो जाओ मम्मी
लो थोडा रंग लगा लो
आज ही खेलो
तुम मेरे संग होली
वो चुप होकर
गुजिया और मठियों 
हो गयीं व्यस्त
खूब थकाया गुजियों ने
होली की सुबह
जल्दी से उठकर
रंग लगाया मम्मी को,
रंग लगाया ताई को, ताऊ को,
और अपने भाइयों को
और हो गयी मैं
कमरे में बंद
जाने फिर आँख लगी
लोग आये भी
और चले गए शायद
जब आँख खुली बाहर सब
ठहाके थे मार रहे
मामा मामी उनके बच्चे
और नानी देख मुझे
खींच लिया कमरे से बाहर
मेरे पांव छूकर मामा-मामी
बोले खेलेंगे अब हम होली
मैं नानी की बांहों में
छुपाकर खुद को 
कहती बस गुलाल लगा लो
मामी रंग पानी में भर
दिया उंडेल मेरे ऊपर
बच्चों ने रंगा गुलाल से
मामा ने टीका लगा
होली पर आशीर्वाद दिया
खूब नचाया नानी को
और बच्चों ने मुझको
दूर हुई थकावट मेरी
मैं होली नानी संग खेली
क्या खूब थी मेरी
इस बार की होली.

Thursday, March 6, 2014

औरत


औरत की पाकीज़गी का ताल्लुक
तो मुझे इस तरह नज़र आता है।
कि आजकल पाकीज़गी भी बस
एक नाम मात्र लफ्ज़ नजर आता है।

समाज ने कभी औरत के मन की
अवस्था से उसे नहीं जानना चाहा
मुहब्बत और वफ़ा के नाम को
हमेशा उसके तन से जोड़ना चाहा।

न दे सकुंगी मैं जवाब जो बच्चा कोई
मुझसे पूछ ले क्या होता हैं बलात्कार?
क्या चल रही बहस, इस शहर में?
प्रश्न से पहले खुद को हटा लेने को हूँ मैं तैयार।

उस सवाल का ख्याल मेरे मन को कचोटता है
कैसी होती है उस आदमी की  मानसिकता
जो बचपन में माँ के दूध को रोता है
बढ़प्पन में वह औरत को नहीं सिर्फ शरीर सोचता है।

मैं चुपचाप ख़ामोश-सी खड़ी ये तमाशा
रोज़ ही अख़बारों और चेनलों पर देखा करती हूँ
किचकिचाती हुई आवाज़ों को रोज़ ही
मैं अपने हाथों तले कानों में भींचा करती हूँ।

यूँ तो अतीत से बेहतर ही अब
इस समाज का नज़रिया होना था
तो फिर क्यों आज भी एक इंसान (औरत ) को
ये समाज किसी और के नज़रिये से तोलना था।

Wednesday, March 5, 2014

मेरी दिल्ली

चटाक… चटाक… सबकी नज़रे एक साथ घूमीं शायद। बस स्टेंड पर रेड लाइट के आगे से पीटते हुए वह औरत उस बच्ची को घसीटती हुई थप्पड़ लगाये जा रही थी।  सबने देखा तो मगर कुछ कहा नहीं।  मैंने भी कुछ नहीं कहा।  हाँ उन तमाचों को महसूस तो किया मगर अपने आप को अपने दुपट्टे में ही कसे रखा।  मैं क्या कहूं वह उसकी माँ है।  जो चाहे कर सकती हैं मैं कौन होती हूँ उन्हें टोक देने वाली।  इस सड़क से गुज़रते मैं तो रोज़ ही इन्हें देखती हूँ। फिर इस बच्ची का खेल भी तो सब देखते ही है।  माँ ढ़ोल पर दो डंडी घसीटती है. . . उससे निकलने वाली धुन पर ये बच्ची अपना करतब दिखती है।  अपने लचीले बदन को बड़ी आसानी से घुमाकर जाने कितने ही तरह के व्यायाम इस रेड लाइट पर कर गुज़रती है।  रामदेव बाबा भी चाहे तो इससे कुछ सीख ले।  मगर फिर भी ये हुनर दो कौड़ी का है। लोग कहां खुश होकर देते है।  वह तो ज़िल्लत भरी भीख़ थमा बैठते है या खड़े-खड़े हुड़की सी लेते रहते है। अपने घर के बच्चों में ममता उडेलते है तो इनपर क्यों झिड़कते हैं।  अपने घर के बच्चों संग तुतलाते हैं और इन संग वो भिड़ जाते हैं।  अपने बच्चों का सुख वह चाहते है और ये नादान माँ संग ही कमाते हैं। बस के न आने तक नजर उसी बच्ची के चेहरे पर थी।  जो माँ के तमाचों से लाल आसुंओ में भीगा था।  न चाहते हुए भी न जाने क्यों उसकी माँ से बात करने की हिम्मत कर ही ली।  दो टूक में अपनी बात कही,  "आज अगर मन नहीं उसका तो रहने दिया होता हाथ क्यों उठा दिया?"  वह मेरे दुपट्टे में बंद चेहरे को देखना चाहती थी पर मैंने दुपट्टा नहीं हटाया। वह अपने गोद के बच्चे को संभालती हुयी मेरी आँखों को घूरती रही। मैंने उस बच्ची को एक बार फिर देखा जो अपनी माँ से दूर जाकर खड़ी थी।  पता नहीं इन्हें कोई देखता क्यों नहीं, या ये लोग ही नहीं चाहते ? सड़को पर ही इनका बसेरा क्यों ? रेड लाइट पर कड़वे बोल सुनकर लोगों की नाराज़गी देखकर इनकी मानसिकता पर क्या असर पड़ता होगा? वह अपना अगला दिन कैसे सोचता होगा सड़क पर फिर से उतरने के लिए।  कई सवाल लेकर मैं अपनी बस का इंतजार करती रही और भीड़ से लदी बस में चढ़ी और अपने क़दमों को जगह देने और खुद के लिए खड़े रह पाने में जुट गई। 

Thursday, February 13, 2014

"ऐसे थे मेरे पापा "

जब भी अकेली हो जाती हूँ
मैं उनका स्पर्श पा लेती हूँ।
कुछ और न बात हो कभी तो,
मैं उनकी यादें दोहराती हूँ।

मेरे नन्हें हाथों को थामें चलना सिखाते ,
कभी गिरने से बचाते,
तो कभी गोद में लेकर
रिश्तों से परिचय कराते थे मेरे पापा।

कभी मेरे हमसफ़र बनकर
वो मेरे साथ मुस्कुराते।
कभी हमराज़ बनकर
मेरे राज़ छुपाते थे, मेरे पापा।

जब मां की डांट-डपट से भी
मैं कोई काम न करती
तब अपने स्नेह और दुलार से
काम के लिए मना लेते थे, मेरे पापा।

खेल में पढ़ने की भूल को समझ
नाराज़ होते थे जब कभी
तो खुद पढ़ने बैठ कर
मुझे पाठ याद दिलाते थे, मेरे पापा।

दिन भर की थकान के बावजूद
वो मेरे हमसाथी बनकर
मेरी उलझनों को सुलझाते
मेरे जवाबों से मुस्कुराते थे, मेरे पापा।

स्कूल के कार्यक्रम पर
जो माँ ने मुझे पहना दी थी साड़ी
तो अपने आंसू छुपाकर
अपनी चिंता को जताते थे, मेरे पापा।

देर रात अकेले बैठ कर
जब लिखा करते थे डायरी
तब मेरी मेरे पूछने की हठ पर
मुझे अपने आप से रु-बी-रु करते थे, मेरे पापा।

यूँ तो मैंने कभी ज्य़ादा चाहा ही नहीं
पर जब कभी ज़ेब से ज्य़ादा मांगा
तब तब उन्हें कोशिश करते देखा
या कभी देरी पर शर्मिन्दा होते थे, मेरे पापा।

होते जो आज तो
मैं उनकी फिक्र का हिस्सा होती
मुझे उस फिक्र से परे,मुस्कराहट ही दे रहे होते
जैसे बचपन में देते थे,  मेरे पापा।

Tuesday, January 7, 2014

Stop Acid Attacks


उम्र ही क्या थी मेरी
जब पहली बार पल्लू में माँ के
मैं, छुप छुप जाया करती थी।
लेकर दुपट्टा उनका 
उनकी तरह उन्हें दोहराती थी।

मुझे इतराते देख मेरी माँ
भर अपनी बांहो में मुझको    वो ज़ोर-ज़ोर से हंसती और चहकती थी।

लिए दुपट्टा मैं  इठलाती
सखियों संग घर-घर खेला करती थी।
कभी अम्मा, कभी चाची, कभी भाभी,
कभी मैं उनकी मम्मी हो जाया करती थी। 

छीन दुपट्टा अपनी माँ से
मैं दूर-दूर भागा करती थी
बड़ा मज़ा था इस खेल में
मैं कुछ से कुछ हो जाया करती थी।

साल गुजरते उम्र के बढ़ते
अब दौर दुपट्टे का भी आया।
अब माँ खुद से खरीद कर
मेरे सीने रख मुझे सवांरती है।

कहती बेटा लड़की तू है
ढकी-ढकी ही भाती है।
सिर  उठाकर, कंधे झुकाकर
वो मुझको चलना सिखाती है।

खुद को आईने में चलता देख
मैं माँ की बात समझी थी।
कई तरह ढंग दुपट्टे को संग अपनाकर
अब खुद को सवांरा करती हूँ।

हाय, एक दिन टीवी पर देख खबर
मेरी माँ भी हुयी रुआंसी
रंग दुपट्टे का कोई भी
उस लड़की को न सवांर पायेगा।

देख चेहरा आईने में अपना
वो पल-पल तेज़ाब को सहती होगी।
क्या वो अब उस दुपट्टे को ले
खुद को सवारती होगी?

काश उन तेज़ाब डालने वालो ने भी
माँ की ममता पायी होती।
सीख़ कोई उन कमज़ोरों को
उनकी माँ ने भी सिखाई होती। 

Monday, January 6, 2014

मैं और मेरा मोहल्ला

सर्द मौसम में बारिश का हो जाना कदमों को घर में ही रोकता है। फिर आज ठण्ड का एहसास भीगा-सा भी है। गली में सब कुछ जैसे बटोरा जा चुका है गली चौड़ी और फैली-सी दिखती है।  आवाजें दबी-दबी रहती है। ऊपर से ये बेरहम बारिश जो सुबह से मुंह खोले बरस रही थी।  हवा में नमी और सड़को पर कीच। ये अंदाज़ था मौसम के चलते। लेकिन जब कानों ने खुद को आज़ाद पाया तो मेरे कदमों ने भी बाहर निकलने की ठान ली।  सर्द मौसम ने हाथों को बग़ल से बाहर निकलने की इजाज़त नहीं दी।  मैं सड़क पर बेपरवाह-सी उतर आई हूँ।  मैं अक्सर कुछ आवाज़ों तले हमेशा अपने क़दमों को अलग-अलग रास्तों पर  लेती हूँ। मगर बारिश ने सड़क को खली और शांत सा कर दिया है। इसलिए हरेक आवाज़ तेज़ और तीखी-सी होती है।  सो जितनी आज़ादी मेरे कानों ने महसूस की उतनी ही आज़ादी मेरे क़दमों ने बटोर ली।  मेरे क़दम रफ़्तार नहीं पकड़ रहे थे बल्कि शांति से अपना सफ़र तय कर रहे थे। 

यूँ तो ये गलियां, ये सड़के , ये नुक्कड़ मेरे लिए नए नहीं है लेकिन बाकि दिनों में, मैं इनसे एक अजनबी-सा रिश्ता बनाकर चलती हूँ। मेरा बचपन इन आवाज़ों को अपने में सोखता शामिल  करता हुआ आगे बढ़ा है कि अब ये आवाज़ें आती भी हैं तो मुझसे टकराकर वापिस चली जाती है।  मुझे पता भी नहीं चलता कि मैंने कुछ अनसुना भी किया। 

अपने बचपन से अबतक आवाज़ों को बदलते सुना है। दुकाने ज्य़ादा हो गई हैं तो वहाँ गुट भी बन जाते हैं जो कि अपने ठहाकों की गूंज से सबके ध्यान को खींच लेते हैं कुछ सड़क से गुजरते दुकान वाले से दुआ-सलाम लेते गुजरते हुए उसे अपने रूटीन में शामिल कर चुके है।  बाइक के हॉर्न अब ज्यादा सुनने को मिलते हैं।  कभी तो डरा ही देती हैं तो कभी इतने करीब से गुज़र जाती हैं कि अचम्भा-सा हो जाता है।  दक्षिण पूरी में अब मंदिर पहले के मुकाबले बहुत हो गए हैं जो टाइम टू टाइम जागरण व भजन-कीर्तन दस्तक देते हैं। सुबह और शाम कुछ तो वक़्त मंदिर की घंटी इस सफ़र की रफ़्तार को कुछ सेकेंड के लिए अपने से बाँध लेती है।     


 मैं रोजाना इन आवाज़ों से कटती हुई इस सड़क से जल्दी से जल्दी निकल जाती हूँ जो मुझे अपने शोर से भीड़ का एहसास देती है।  आज सड़क खाली है फिर भी उन सबकी गूँज की कम्पन मेरे शरीर को छू रही हो जैसे और मुझे इधर-उधर आवाज़ तलाशने पर मजबूर कर रही हो।  लगातार आवाज़ों के बीच से गुज़रते रहना इस एहसास में धकेल देता है कि उन आवाज़ों क़ी छाप दिमाग में बैठ जाती है। 


Thursday, December 19, 2013

यूँ दो टूक बाते

कदम दर कदम बढ़ते जा रहे थे और नज़र इधर से उधर  कभी नीचे तो कभी.… कितना बदला हुआ लगता  शाम का वक़्त यहाँ सड़क के  किनारों पर धुंआ -धुंआ बिखरा, उढ़ता हुआ जा  है.… घरों के  बाहर  सबके चूल्हों पर रोटियां सिक  रही हैं।

वहीं मुँडेरियों पर खेलते बच्चों के हाथों में उनकी माँ रोटियां थमाए उन्हें कपडे से भी ढक रही हैं ठण्ड की ओस से भीगे कपड़ों में वो नन्हे  उसे छोड़ भागते हैं।  इस ठण्ड से बेखबर से  बच्चे इस ठण्ड के मौसम को भी गर्मी  दे रहे हैं। … बगल से ही गुजरती इस सड़क पर रेड-लाईट  होते ही अपना हुनर प्रस्तुत करना  शुरू कर देते हैं। नज़र ठहर सी ही है इस सड़क से गुज़रते हुए।

आगे जाते हुए और उनकी नज़रों से नज़र मिलते होठों के छोरों से निकल गया.…कि बन गया खाना ?
अपनी फुकनी मुंह के आगे से हटाते हुए और मुस्कराहट बिखराकर गीली आँखों को भींचते हुए  कहा , हाँ बना रहे हैं दिहाड़ी पर निकलना है न।  दिन में तो  बच्चा कर खाते है।

यूँ दो टूक बाते कर उस सड़क से गुज़रना होता है और हर दिन में एक डर भी सीने से गुज़रता है। इन नन्हों का यूँ बेफिक्री से सड़क के बीच उतर जाना।  

Sunday, December 1, 2013

कुछ इस तरह मैं बस का सफ़र करती रही-2

कुछ इस तरह मैं
बस का सफ़र करती रही
आज मेरे भी साथ
वो महिला ही बैठी 
जो कल की बखिया
उधेड़ी थी जा रही
आज भी बस में
मुझसे वो टकरा गई
भूल जाऊं
अगर कल का मैं किस्सा
छेड़ा था गर लड़की को उसने
पिट गया सरेआम
वो बेशर्म निहत्ता
क्या कर गुज़रते
लोग उसके साथ
गर उतर ही ना जाता
बस से वो लड़का
अब तो बस में
रोज़ कि ही ये बात है
हर एक की नज़र में
लड़की न जाने क्यों शिकार है
बिन छुए भी करते हैं
लड़की से छेड़छाड़
वो नज़रे उठाकर
देख ले जो एक बार
डर ही जाता है
दुपट्टा भी हया का
बेहयाई इस क़दर
वो आँख से उतारते है 
लुट-सी जाती है
पल में आबरू
नग्न मानसिकता के
कुछ चढ़ते है रोगी
शक्ल से होते कभी हमउम्र,
कभी अंकल, और कभी बच्चे
मगर नियत से होते है
वो शारीर के भोगी
भीड़ की ओटक लिए
करते  हैं हरकत छीछोरी
चुप- सी खड़ी अपने वो
सम्मान को सम्भालती
कर ही देते  हैं उस माँ को भी
ये कमबख्त शर्मसार-सा।
कल सुकून मन को
मेरे भी आ गया
भूत कल छेड़ने का
जो उसका छू हो गया
उसकी बेहयाई के मुह पर
लड़की ने मारा तमाचा
अम्मा भी याद
आ गई होगी वही पर

किरण

Saturday, November 30, 2013

मैं आज बस का सफ़र कुछ इस तरह करती रही

मैं आज बस का सफ़र
कुछ इस तरह करती रही
भीड़ थी  बस में बहुत,
धक्कों से, एक- एक कर कदम को,
मैं सतह पर रखती रही
चढ़ी थी गेट के आगे से मैं,
तो ड्राईवर की आँख की किरकिरी बनी
 कहना चाहा था बहुत उसने मगर,
भीड़ के चलते न कहते बनी
पा ली थी क़दमों ने मेरे 
बस की सतह पर जगह अपनी,
नज़रों को फ़ुरसत से को बाहर करती
अब भीड़ से बेखबर-सी मैं बनी।
दो- चार स्टेंड के बाद ही,
भीड़ का बवंडर चढ़ा
हाय तौबा न जाने ये कैसी मची
कुछ घुट रहे, कुछ लटक रहे
लोग सामान की लग रहे थे पोटली,
मिलने और बिछुड़ने के बीच में,
एक रोज़ की थी ये  गतिविधि
जिसमें थोड़ा प्यार, थी थोड़ी नफरत भी ,
ख़ामख्वाह झगड़ा था, जलन थी,
 कुढ़न थी, सहारे थे और ठहाके थे,
कुछ भीड़ में खुद को फिट कर रहे थे
कुछ बस में इसी का फायदा भी उठा रहे थे
पीछे से आती आवाज़ों ने
समेट लिया था सबका ध्यान
लड़की ने पीटा था
लड़के को एक पल में
लड़के की माफ़ी पर दो-चार ने किये
किए अपने साफ हाथ भी
अगले स्टेंड लड़का पीटते हुए निकला
कुछ चुभती-घूरती नज़रे,
कुछ जाने-पहचाने चेहरे थे,
कुछ अनजाने-से थे,
बस में ये टॉपिक रोज का था
आज का मुद्दा वो लड़की थी
हर किसी की जुबां पर
बखिया उधेड़ी थी जा रही
लड़की शर्म से थी रो पड़ी
अब अंकल ने भी अपनी सीट उसे दी
चंद ही लम्हों के सफ़र में 
क्या हरकत कर गुज़रते हैं
वो साथ बैठी महिला थी दोहरा रही 



किरण

Saturday, November 23, 2013

अहसास










ऐ हवा तू मुझे छुआ ना कर
तेरी छुअन में मुझे उसकी आहट लगती है।
उसका चेहरा तक मैने नहीं देखा
फिर क्यूँ तू उसका अहसास देती है।


किरण
 

तुम

दीवाना बनाते हो आंखों से तुम
पागल करते हो अपनी बातों से तुम
आख़िर मेरे क्या लगते हो तुम
जितनी दूर जाती हूँ तुमसे
उतने ही पास आते हो तुम

कहना क्या चाहते हो तुम
समझाओ मुझे अपना हर इशारा
कुछ महसूस कराना चाहते हो मुझे
लेकिन कहने से पहले ही घबराते हो तुम
शायद, अपने ही किसी अहसास से डर जाते हो तुम।



किरण

Sunday, November 17, 2013

राहुल आएगा आज बस्ती में


राहुल गांधी आया रे
वादा पुराना लाया रे
डंका बजा है बस्ती में
आया राहुल बस्ती में।

दो दिन से यहाँ हल्ला है
भारी राहुल का पल्ला है 
आज ग्रामीण सेवा मद्दी  है
हुयी परेशां पब्लिक है।

सड़क सफाई वाह जी वाह
वर्कर की धुलाई वाह जी वाह
सालों रहे जो सोये थे
आज काम पर आये हैं।

डंका सुन राहुल गांधी का
समां शांति का बंधा हुआ
हर कौने में पुलिस खड़ी
नज़र गढ़ाए पब्लिक पर।  

पब्लिक मगर सब जानती है
देख पुलिस हर कौने पर 
उनकी टोका-टाकी पर
उन्हें कोसती, फिर हस्ती हुयी गुज़रती है।

घर के  बाहर पुलिस देखकर
मेरा मन पुलकित-सा  होता
रहते जो ये  ऐसे ही खड़े  
न कोई चोरी होती, न कोई सम्मान को रोता। 


किरण

आज सुबह घर से बाहर निकलते ही मेरे सामने कुछ नज़ारा  बदला-सा ही था।  राहुल गांधी के आने से पहले सुबह कुछ यूँ बदली होगी शायद पब्लिक ने भी नहीं सोचा था।  








Friday, September 6, 2013

litsener at work


मायाराम जी अपनी चाय का ठीया जामाये 12-13 सालों से इसी कौने में गुज़र-बसर कर रहे हैं। साथ में सब्जी वाले का ठीया है। इंटो और टूटी-फूटी सिल्लियों पर छोटे सिलिन्डर को टिकाए उसके चारों तरफ कनिस्तर की टीन से ओट किये उसपर चाय खोला रहे हैं। साथ में ही दो लोगों के बैठने का ठीया भी जमा दिया है। कस्टमर को चाय थमाते हुये अपनी मुस्कुराहट में अपना बकाया कर्ज़ा भी मांग रहे हैं।

कस्टमर उन्हें हाथ दिखाते हुये चाय लेकर चला गया। मायारामजी ने भी उसकी बात समझ कर अपना मोबाईल थाम उसके "कीपेड” की टूं-टूं-टू-उउउउउउ से कुछ देर जूझने के बाद नतीजे पर आए यानि अपना पसंदीदा गाना तेज चिल्लाकर मोबाईल को वहीं साईड में उल्टा रख दिया। दो कप चाय और चढ़ा दी।

ये ठीया वाक़ई में सालों पुराना लगता है। इसके छप्पर में कई पुराने जोड़ और नये जोड़ साफ देखे जा सकते हैं। नीचे की त्रिपाल गली हुइ-सी है उसके उपर की त्रिपाल भी ज़्यादा नई नहीं है। कदमों तले आती इंटे घिसी हुई दबी हुई महक रही है। जिसे बयां नहीं किया जा सकता। इस ठीये के चारो तरफ कई ठेले वाले भी अपनी-अपनी दुकानदारी में मशगूल हैं और मायाराम जी, अपने मोबाईल पर पाहाड़ी गाना लगाकर अपनी नज़रों को दूर-और-दूर ले जाते और खौलती चाय की सरररररर सुनकर वापिस अपनी नज़र को सिमित कर उसे खौलाते....आसपास बहुत शोर है। सड़क से गुज़रती-चिखती, हॉर्न मारती गाड़ियां, आलु वाला मोबाईल पर गाने चलाकर खुद ही उसे दोहराता। मायाराम जी भी चाय के खौलते पानी में चीनी-पत्ती डालते हुये अपने पहाड़ी गाने दोहराते हुए बोल पड़े...... “ये मोबाईल भी बढ़िया चीज़ है जब कुछ और सुनने का मन ना हो तो इसे चला लो। मुझे गाने बहुत पसन्द है। मै यहां बैठकर अपने में मस्त रहता हूँ कहते हुए वो मुस्कुरा दिये।"

मायारामजी से जब पूछा- यहाँ इतने शोर में ऐसी कौन-सी आवाज़ है जो आपके रुटीन में फर्क डालती है या आपसे जुड़ी है?

वो एक बार फिर मुस्कुराए और ठीये में पड़ा कुड़ा-करकट उठाकर इस पिछे पार्क में फेकते हुये खामोश बैठ गये। मोबाईल का गाना चेन्ज किया पर कुचह बोले नहीं। शायद वो सावाल सामाजह नहीं पाये या जवाब नहीं कोई। उन्होंने खौलती चाय दो कप में डाली। एक कप खुद के लिये भी डाल ली। चाय की चुस्कियां भरते हुए युहीं उनसे फिर एक और सवाल मेरे दोस्त ने पुछ लिया- कितनी चाय हो जाती है दिनभर में आपकी? तो वो मोबाईल रखते हुये- "सात-आठ चाय हो जाती है मेरी भी। पूरा दिन खाली बैठे, नींद तो यहां आएगी नहीं यहां तो आवाज़ें ही इतनी रहती है दोपहर हप या सांझ। सड़क का चौराहा है ना तो आवाज़े कभी शांत नहीं होती, हर टाईम कान खाती हैं इसलिए मै अपने मोबाईल में गाने चलाकर उन आवाज़ों को कम करता हूँ या चाय कि दो घूंट के साथ कस्टमर से बतिया लेता हूँ।"

इतना कह वह चुप हुये और फिर बोले....... “वो सामने ढ़ाबे पर नान की रोटी बनाने की आवाज़ आ रही है ना"। वो खुद ही मुस्कुराए और बोले- “मैने भी बहुत बनाई है। हाथ दर्द हो जाते थे। दिल्ली में बहुत जगह काम किया है मैने। नान बनाना भी कोइ ऐसे ही नहीं है। एक बार मै होटल में नान की रोटी बना रहा था तो मेरा मालिक आया और मुझे ज़ोर से चांटा मारा। मै भुजक्का-सा रह गया। समझ नहीं आया क्या हुआ उन्हें। अपने बाकि साथी की तरफ देखा और लज्जित सा खड़ा मालिक को देखा। उन्होंने पूछा- “ समझ आया क्यों मारा? मैने ना में गर्दन हिलाई। मालिक ने हाध धोए और तुरन्त एक रोटी बनाकर दिखाई और पूछा- अब समझ आया? मैने कहा- नहीं। उसने फिर एक रोटी बनाकर दिखाई। मै तब भी समझ नहीं पा रहा था कि हो क्या रहा है? तब मालिक ने गुस्से में कहा- ये होटल है तेरा घर नहीं। रोटी बना रहा है तो पता भी चलना चाहिये तेरे हाथों कि थाप से। इस तरह उसने एक और रोटी बना डाली। मै अकसर उस आवाज़ पर रुक जाता हूँ। जब उस होटल में वो हाथों की थाप मेरे कानों में पड़ती है तब पता चल जाता है लन्च तैयार हो रहा है। वो ये कहते-कहते चाय के प्याले धोने लगे और उस ढाबे वाले की तरफ निहारते रहे।

चाय की चुस्कियों के साथ मायारामजी मेरे पहले सवाल का जवाब देते चले गये और हम उनकी यादों के उस लम्हें का हिस्सा बन गये जिसे वो अकसर अकेले ही जिया करते होंगे.....


किरण

Wednesday, July 10, 2013

अब रोज़ सुबह ऐसी होती है


अब रोज़ सुबह मेरी, कुछ इस तरह होती है,
मेरे उठने से पहले ही, मां आवाज़ मुझे लगाती है।
मै अलसाई आंखो से, उन्हें टोक दिया करती हूँ,
कहाँ जाना अब करके तैयारी,
घर में ही तो सारा दिन बिताती हूँ।

माँ झुंझला कर कहती बेटा,
लड़की जात न सोती इतना, पराए घर जाना है तुझको,
बहुत हुआ नौकरी का चक्कर, ये कभी न भाए मुझको।
देर से सोना, देर से उठना ये क्या रीत चला ली है,
तेरा जल्दी उठकर पूजा करना, कहां ये सीख भुला दी है।

खींच के चादर अपने शरीर पर, बस 5 मिनिट, बस 5 मिनिट,
इतना कह मैं फिर आंखों पर, नींद की चादर ढकती हूँ।
माँ फिर झुंझलाकर कहती मुझसे,
वही सुबह है वही शाम, बस दुनिया तेरी बदली है।

मैं उनिदि पलकों से माँ को घूरे रहती हूँ,
मेरा गुस्सा जान मेरी माँ, मिठी-सी मुस्कान दिए माँ,
मेरा हाथ थामे, मिठी चाय का कप दिए,
नौ बजे हैं, ये सुबह नहीं.....होले से कहती है। 

हम्महम्म  करके मैं चाय पकड़ती, अपना धीर बंधाती हूँ,
सुबह-सुबह बरसती ममता, अपनी माँ की मैं पाती हूँ।
उसकी बाहों मे सिर रख बच्ची सी बन जाती हूँ,
स्पर्श प्रेम का पाकर माँ का, फिर उसी पल सो जाती हूँ।

kiran

Monday, July 8, 2013

ख़्वाहिश



ख़्वाहिशें हैं दिल में कुछ बनने की
तमन्ना है ज़िन्दगी में कुछ पाने की।
शायद ये ख़्वाहिशें मेरी पूरी हो
क्योंकि सोच के दायरे से बनी है
ये एक ख़ूबसूरत-सी ख़्वाहिश।
इच्छा है तो सिर्फ सफलता की
जो तुफान की लहरों की तरह
उम्मीद बनके कभी न कभी
मेरी ज़िन्दगी में सच होने आएगी
क्योंकि है ये एक ख़ूबसूरत-सी ख़्वाहिश।

मैं वो नहीं




'उफ' तेरी ये मदहोश निगाहें
क्यों मेरा साथ कभी छोड़ती नहीं।
जब भी देखा है पलके उठाकर
अपने सिवा कोई नज़र आता नहीं।

न जाने ये आंखें क्या कहना चाहती है
'हाँ' खामोश तो कभी ये रहती नहीं।
तेरी आंखे मुझे एक ख़्वाब दिखाना चाहती है
मगर जुबाँ तेरा साथ देती नहीं।

खिंची चली आती हूँ मैं तेरी ओर
पर रोक लेता है मेरा ये दिल।
तूने किया नहीं इकरार कभी
इसलिए बस, दिल बार-बार यही दोहराता है... 
मैं वो नहीं,मैं वो नहीं।