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Tuesday, May 19, 2015

क्या दोस्ती हार गई


यार तुम कहीं पागल तो नहीं हो गए हो लड़की ने खिजियाते हुए कहा।
लड़का मुस्कुराते हुए- पागल की क्या बात है यार। जो मन में आता है वही कह जाता हूँ। 
लड़की - तो गर्ल फ्रेंड बनाओ न। दोस्तों के साथ ऐसी बात। गलत है।
लड़का बात टालते हुए- चलो न डेट करते हैं। उम्र निकल रही है यार।
लड़की- चुप करो समझे तुम।
लड़का- 10-12 किस करते हैं तुम्हें ठीक लगे तो आगे बढ़ जायेंगे। वरना रहने देंगे। 
लड़की गुस्स से- तुम्हें एक अच्छा दोस्त बने रहने में क्या प्रॉब्लम है? ऐसा क्यों सोचते हो मुझे लेकर? 
लड़का- पता नहीं। लेकिन तुम अच्छी लगती हो। तुम्हारा फिगर भी बहुत बढ़िया है। 
लड़की-यार तुम्हे एक दोस्त और गर्ल फ्रेंड में अंतर समझ नहीं आता क्या? या तुम मुझे ऐसा वैसा समझते हो?
लड़का-नहीं यार तुम्हारे लिप्स बहुत अच्छे है। किस करने को मन करता है ।
लड़की फिर गुस्से से- ऐसा है आज के बाद मुझसे बात मत करना प्लीज़।
लड़का- तुम इतनी बढ़ी हो गयी हो एक बार सेक्स करने में क्या जाता है। बन जाओ तुम मेरी गर्ल फ्रेंड। बस एक ही तो प्रॉब्लम है कि हम शादी नहीं कर सकते। तुम्हें भी पता होना चाहिए यार एन्जॉय क्या होता है। सबसे करीब हो मेरे और करीब आ जाओगी तो क्या गलत है।
लड़की- गलत ? ये तुम्हे सही लगता है। संगत ही गलत है तुम्हारी। दोस्त कहते हो और ये सब बातें?????
लड़का- यार इससे दोस्ती ख़राब थोड़े होगी। प्यार भी करता हूँ तुम्हें।
लड़की समझाने की हद ख़त्म करते हुए- देखो अगर यही सब सोचते हो मुझे लेकर तो आज के बाद मुझसे बात मत करना। 
लड़का-ठीक है ।
लड़की रोती है और एक अच्छे दोस्त को खोकर अपने आंसू पोछती है लेकिन ये इस बात से भी सन्तुष्ट थी कि दोस्त गलत राह में है। वह सोचती है ये कैसा प्यार है नज़दीकी है की शरीर की चाह है लेकिन जीवन में आगे चलने का हौसला नहीं।।

कभी-कभी समझ नहीं आता रिश्तों को कैसे समझा जाए। साथ छूटने का दुःख होता है लेकिन रिश्ते में होना घुटन पैदा कर देता है। बेबाक होना हमेशा सुखद नहीं होता किसी के लिए।

Sunday, May 17, 2015

आरुषि और मै



कल सुबह की ही तो बात है। रोज़ की तरह ऑंखें मलती घर में आकर अपनी मुस्कान बिखेरती हुई कहती है। उठ गई दीदी तुम। 
कल भी मेरी आँख तो खुल गई थी लेकिन कुछ देर बिस्तर पर सुस्त पड़े रहना भी अच्छा लगता है। आरुषि कमरे में आई और मेरा हाथ पकड़ कर कहती-

आरुषि- दीदी उठो न। 
मैने करवट लेते हुए कहा- अरे आज तो जल्दी उठ गई आरुषि। 
वो मुस्कुराती हुई जल्दी से बोली- हमारे स्कूल की न छुट्टी पड़ गई। आज तो छुट्टी है।
मैं उठ बैठी और पानी पीकर बोली- अच्छा। अब तो दादी के घर जायेगी आरुषि।है न।
आरुषि- अरे नहीं दीदी। आपको तो पता भी नहीं। हमने तो नया घर ले लिया। आज मम्मी सामान ले जायेगी। मम्मी की भी छुट्टी है और पापा की भी छुट्टी है। बहुत दूर जा रे हैं हम। इस गली में।
वह कहती हुई कभी मेरे भाई को उठाती कभी मेरे मम्मी से बात करने लग जाती।

आज सुबह से आरुषि घर नही आई और न ही सुबह से कोई आवाज़ सुनी। पूछने पर पता चला कि वह हमारे साथ वाला मकान ख़ाली करके चले गए हैं। दो साल से कितनी ही सुबह आरुषि की सच्ची झूठी कहानियों और कितने ही सवालों से हॉच-पॉच होकर गुज़री है। मम्मी से तो बहस ही करती रही है। आज दिन के 8 घण्टे उसकी किसी भी हरकत को देखे बिना गुज़र गए। सन्डे भी सन्डे जैसा नहीं और सुबह भी सुबह जैसी नहीं। 


मुझे पता ही नहीं चला की घर खाली करने की बात सच्ची थी। लगा रोज़ की इतनी कहानियां वो ख़ुद ही तो रच लेती है बातों ही बातों में। अपनी कहानी में ढ़ेरों चित्र ऐसे बुनती की उनका सही दायरा बनाना मेरे बसका तो नहीं होता था। हर चीज़ दायरे से बाहर होती आज़ाद होती। मम्मी किसी बात के लिए टोकती हैं तो साफ़ साफ़ न कह देती है जिसपर मेरे होठों पर मुस्कान आ जाती है।

Wednesday, November 19, 2014

दिल्ली दर बदर

कदम दर कदम बढ़ते जा रहे थे और नज़र इधर से उधर  कभी नीचे तो कभी.… कितना बदला हुआ लगता  शाम का वक़्त यहाँ सड़क के  किनारों पर धुंआ -धुंआ बिखरा, उढ़ता हुआ .… घरों के  बाहर  सबके चूल्हों पर रोटियां सिक  रही हैं।

वहीं मुँडेरियों पर खेलते बच्चों के हाथों में उनकी माँ रोटियां थमाए उन्हें कपडे से भी ढक रही हैं ठण्ड की ओस से भीगे कपड़ों में वो नन्हे  उसे छोड़ भागते हैं।  इस ठण्ड से बेखबर से  बच्चे इस ठण्ड के मौसम को भी गर्मी  दे रहे हैं। …

 बगल से ही गुजरती इस सड़क पर रेड-लाईट  होते ही अपना हुनर प्रस्तुत करना  शुरू कर देते हैं। नज़र ठहर सी ही है इस सड़क से गुज़रते हुए।

आगे जाते हुए और उनकी नज़रों से नज़र मिलते होठों के छोरों से निकल गया.…कि बन गया खाना ?
अपनी फुकनी मुंह के आगे से हटाते हुए और मुस्कराहट बिखराकर गीली आँखों को भींचते हुए  कहा , हाँ बना रहे हैं दिहाड़ी पर निकलना है न।  दिन में तो  बच्चा कर खाते है। यूँ दो टूक बाते कर उस सड़क से गुज़रना होता है और हर दिन में एक डर भी सीने से गुज़रता है। इन नन्हों का यूँ बेफिक्री से सड़क के बीच उतर जाना।