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Thursday, March 6, 2014

औरत


औरत की पाकीज़गी का ताल्लुक
तो मुझे इस तरह नज़र आता है।
कि आजकल पाकीज़गी भी बस
एक नाम मात्र लफ्ज़ नजर आता है।

समाज ने कभी औरत के मन की
अवस्था से उसे नहीं जानना चाहा
मुहब्बत और वफ़ा के नाम को
हमेशा उसके तन से जोड़ना चाहा।

न दे सकुंगी मैं जवाब जो बच्चा कोई
मुझसे पूछ ले क्या होता हैं बलात्कार?
क्या चल रही बहस, इस शहर में?
प्रश्न से पहले खुद को हटा लेने को हूँ मैं तैयार।

उस सवाल का ख्याल मेरे मन को कचोटता है
कैसी होती है उस आदमी की  मानसिकता
जो बचपन में माँ के दूध को रोता है
बढ़प्पन में वह औरत को नहीं सिर्फ शरीर सोचता है।

मैं चुपचाप ख़ामोश-सी खड़ी ये तमाशा
रोज़ ही अख़बारों और चेनलों पर देखा करती हूँ
किचकिचाती हुई आवाज़ों को रोज़ ही
मैं अपने हाथों तले कानों में भींचा करती हूँ।

यूँ तो अतीत से बेहतर ही अब
इस समाज का नज़रिया होना था
तो फिर क्यों आज भी एक इंसान (औरत ) को
ये समाज किसी और के नज़रिये से तोलना था।

Wednesday, March 5, 2014

मेरी दिल्ली

चटाक… चटाक… सबकी नज़रे एक साथ घूमीं शायद। बस स्टेंड पर रेड लाइट के आगे से पीटते हुए वह औरत उस बच्ची को घसीटती हुई थप्पड़ लगाये जा रही थी।  सबने देखा तो मगर कुछ कहा नहीं।  मैंने भी कुछ नहीं कहा।  हाँ उन तमाचों को महसूस तो किया मगर अपने आप को अपने दुपट्टे में ही कसे रखा।  मैं क्या कहूं वह उसकी माँ है।  जो चाहे कर सकती हैं मैं कौन होती हूँ उन्हें टोक देने वाली।  इस सड़क से गुज़रते मैं तो रोज़ ही इन्हें देखती हूँ। फिर इस बच्ची का खेल भी तो सब देखते ही है।  माँ ढ़ोल पर दो डंडी घसीटती है. . . उससे निकलने वाली धुन पर ये बच्ची अपना करतब दिखती है।  अपने लचीले बदन को बड़ी आसानी से घुमाकर जाने कितने ही तरह के व्यायाम इस रेड लाइट पर कर गुज़रती है।  रामदेव बाबा भी चाहे तो इससे कुछ सीख ले।  मगर फिर भी ये हुनर दो कौड़ी का है। लोग कहां खुश होकर देते है।  वह तो ज़िल्लत भरी भीख़ थमा बैठते है या खड़े-खड़े हुड़की सी लेते रहते है। अपने घर के बच्चों में ममता उडेलते है तो इनपर क्यों झिड़कते हैं।  अपने घर के बच्चों संग तुतलाते हैं और इन संग वो भिड़ जाते हैं।  अपने बच्चों का सुख वह चाहते है और ये नादान माँ संग ही कमाते हैं। बस के न आने तक नजर उसी बच्ची के चेहरे पर थी।  जो माँ के तमाचों से लाल आसुंओ में भीगा था।  न चाहते हुए भी न जाने क्यों उसकी माँ से बात करने की हिम्मत कर ही ली।  दो टूक में अपनी बात कही,  "आज अगर मन नहीं उसका तो रहने दिया होता हाथ क्यों उठा दिया?"  वह मेरे दुपट्टे में बंद चेहरे को देखना चाहती थी पर मैंने दुपट्टा नहीं हटाया। वह अपने गोद के बच्चे को संभालती हुयी मेरी आँखों को घूरती रही। मैंने उस बच्ची को एक बार फिर देखा जो अपनी माँ से दूर जाकर खड़ी थी।  पता नहीं इन्हें कोई देखता क्यों नहीं, या ये लोग ही नहीं चाहते ? सड़को पर ही इनका बसेरा क्यों ? रेड लाइट पर कड़वे बोल सुनकर लोगों की नाराज़गी देखकर इनकी मानसिकता पर क्या असर पड़ता होगा? वह अपना अगला दिन कैसे सोचता होगा सड़क पर फिर से उतरने के लिए।  कई सवाल लेकर मैं अपनी बस का इंतजार करती रही और भीड़ से लदी बस में चढ़ी और अपने क़दमों को जगह देने और खुद के लिए खड़े रह पाने में जुट गई। 

Thursday, February 13, 2014

"ऐसे थे मेरे पापा "

जब भी अकेली हो जाती हूँ
मैं उनका स्पर्श पा लेती हूँ।
कुछ और न बात हो कभी तो,
मैं उनकी यादें दोहराती हूँ।

मेरे नन्हें हाथों को थामें चलना सिखाते ,
कभी गिरने से बचाते,
तो कभी गोद में लेकर
रिश्तों से परिचय कराते थे मेरे पापा।

कभी मेरे हमसफ़र बनकर
वो मेरे साथ मुस्कुराते।
कभी हमराज़ बनकर
मेरे राज़ छुपाते थे, मेरे पापा।

जब मां की डांट-डपट से भी
मैं कोई काम न करती
तब अपने स्नेह और दुलार से
काम के लिए मना लेते थे, मेरे पापा।

खेल में पढ़ने की भूल को समझ
नाराज़ होते थे जब कभी
तो खुद पढ़ने बैठ कर
मुझे पाठ याद दिलाते थे, मेरे पापा।

दिन भर की थकान के बावजूद
वो मेरे हमसाथी बनकर
मेरी उलझनों को सुलझाते
मेरे जवाबों से मुस्कुराते थे, मेरे पापा।

स्कूल के कार्यक्रम पर
जो माँ ने मुझे पहना दी थी साड़ी
तो अपने आंसू छुपाकर
अपनी चिंता को जताते थे, मेरे पापा।

देर रात अकेले बैठ कर
जब लिखा करते थे डायरी
तब मेरी मेरे पूछने की हठ पर
मुझे अपने आप से रु-बी-रु करते थे, मेरे पापा।

यूँ तो मैंने कभी ज्य़ादा चाहा ही नहीं
पर जब कभी ज़ेब से ज्य़ादा मांगा
तब तब उन्हें कोशिश करते देखा
या कभी देरी पर शर्मिन्दा होते थे, मेरे पापा।

होते जो आज तो
मैं उनकी फिक्र का हिस्सा होती
मुझे उस फिक्र से परे,मुस्कराहट ही दे रहे होते
जैसे बचपन में देते थे,  मेरे पापा।